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2015-07-13T23:45:15+05:30

चारुचंद्र की चंचल किरणें, खेल रहीं हैं जल थल में,
:स्वच्छ चाँदनी बिछी हुई है अवनि और अम्बरतल में।
पुलक प्रकट करती है धरती, हरित तृणों की नोकों से,
:मानों झूम रहे हैं तरु भी, मन्द पवन के झोंकों से॥


क्या ही स्वच्छ चाँदनी है यह, है क्या ही निस्तब्ध निशा;
:है स्वच्छन्द-सुमंद गंध वह, निरानंद है कौन दिशा?
बंद नहीं, अब भी चलते हैं, नियति-नटी के कार्य-कलाप,
:पर कितने एकान्त भाव से, कितने शांत और चुपचाप!
-- मैथिलीशरण गुप्त
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