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2015-12-30T21:53:44+05:30
राजा भर्तृहरि ने नीतिशतक में लिखा है, 'सूर्य कमल को स्वयं खिलाता है। चंद्रमा कुमुदिनी को स्वयं विकसित करता है। बादल स्वयं, बिना किसी के कहे, जल देता है। महान आत्माएं यानी श्रेष्ठ जन अपने आप दूसरों की भलाई करते हैं।' इसका आशय यह है कि प्रकृति का हर तत्व दूसरों की भलाई बिना किसी के कहे करता है। यही वजह है कि हमें भौतिक जगत का प्रत्येक पदार्थ मनुष्य के उपकार में लीन दिखता है। सूर्य, चंद्रमा, तारे, आकाश, वायु, अग्नि, जल, पृथ्वी, औषधियां, वनस्पतियां- फल, फूल और पालतू पशु दिन-रात मनुष्य के कल्याण में लगे हुए हैं। ये सभी दूसरों के उपकार के लिए कुछ न कुछ देते हैं। यदि ये परोपकार में लगे हैं तो एक मनुष्य को दूसरे मनुष्य के प्रति उपकार क्यों नहीं करना चाहिए? प्रकृति का यह एक महान संदेश है। जैसे सूर्य अपना प्रकाश स्वयं ही सब को समान रूप से देता है, हमारे जीवन का उद्देश्य भी ऐसा ही होना है। जैसे बादल हमें जल देते हैं और किसी से यह नहीं पूछते कि 'तुम सुपात्र हो या नहीं', वैसे ही हमारा जीवन भी दूसरों को देने के लिए है। वेदों में कहा गया है कि मनुष्यों को ऐसा पवित्र और शुद्ध जीवन जीना चाहिए जिससे संसार में भ्रातृ भावना और मानव समाज के प्रति उपकार की भावना, दानशीलता और सृजनता की भावना पैदा हो। वेद दर्शन का सार है कि हम उत्तम बन कर, उत्तम कर्म करें। असल में, पापों से मुक्त होने और मोक्ष पाने का यही एकमात्र तरीका है। एक व्यक्ति वैसे तो नियम से वेद मंत्रों का उच्चारण करता है, यज्ञ तथा अन्य धार्मिक अनुष्ठानों का आयोजन करता है, लेकिन वह परोपकार का कोई काम नहीं करता है। तो ऐसे व्यक्ति के धार्मिक अनुष्ठानों का कोई औचित्य नहीं। अच्छे बनो और अच्छे कर्म करो- यह सिद्धांत सत्य के सिद्धांत पर आधारित है। हमारी समस्या है अच्छे और बुरे में भेद कैसे करें? सत्य और असत्य में, ठीक और गलत में कैसे फर्क करें? किसी वस्तु के गुणदोषों को जानने का सब से अच्छा तरीका यह है कि सत्य-असत्य के सिद्धांत को अपने ऊपर लागू करें। हम यह सोचें कि जब हम अच्छा करेंगे, तो अच्छा अनुभव होगा। जब हम गलत काम या कोई दुष्टता करेंगे तो बुरा ही अनुभव होगा। सौ बात की एक बात कि दूसरों के साथ वैसा ही व्यवहार करें, जैसा कि आप अपने साथ चाहते हैं। अल्बर्ट आइंस्टीन ने कहा था- 'यह हरेक व्यक्ति का दायित्व बनता है कि वह संसार को उतना तो अवश्य लौटा दे, जितना उसने इससे लिया है। दूसरों के लिए जीया गया जीवन ही उचित जीवन है। इसलिए जो कुछ हमारे पास है, उसमें से कुछ परोपकार में अवश्य लगाएं। चाणक्य ने कहा था- "परोपकार ही जीवन है। जिस शरीर से धर्म नहीं हुआ, यज्ञ न हुआ और परोपकार न हो सका, उस शरीर का क्या लाभ? सेवा या परोपकार की भावना चाहे देश के प्रति हो या किसी व्यक्ति के प्रति, वह मानवता है। परोपकार से ही ईश्वर प्राप्ति का मार्ग खुलता है। व्यक्ति जितना परोपकारी बनता है, उतना ही ईश्वर की समीपता प्राप्त करता है। परोपकार से मनुष्य जीवन की शोभा प्राप्त करता है। परोपकार से मनुष्य जीवन की शोभा और महिमा बढ़ती है। सच्चा परोपकारी सदा प्रसन्न रहता है। वह दूसरे का कार्य करके हर्ष की अनुभूति करता है।" परोपकार की प्रवृत्ति को अपना कर हम एक प्रकार से ईश्वर की रची सृष्टि की सेवा करते है। ऐसा करने से हमें जो आत्मसंतोष और तृप्ति मिलती है, उससे हमारी सारी संपत्तियों की सार्थकता साबित होती है। परोपकार की एक आध्यात्मिक उपयोगिता भी है। वह यह है कि हम दूसरों की आत्मा को सुख पहुंचा कर अपनी ही आत्मा को सुखी बनाते हैं। जब हम परोपकार को अपना स्वभाव बना लेते है तो उसका दोहरा लाभ होता है। परोपकार की नीति के तहत किसी की सहायता करके और दूसरों के प्रति सहानुभूति दर्शा कर जिन दीनहीनों का कष्ट दूर किया जाएगा, उनमें सद्भावपूर्ण मानवीय चेतना जाग्रत होगी। ऐसा होने से वे भी दूसरों की सेवा और सहयोग करने का महत्व समझने लगते हैं।
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