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2016-04-09T09:14:54+05:30
मानवीय व्यक्तित्व का निर्माण मनुष्य की अपनी सूझ-बूझ, एकाग्रता, परिश्रम और पराक्रम का प्रतिफल है। ऐसा प्रतिफल, जो जगत के अन्य उपार्जनों की तुलना में कहीं अधिक महत्वपूर्ण और कहीं अधिक प्रयत्‍‌न-साध्य है। इस प्रतिफल की प्राप्ति में संकल्प शक्ति, साहसिकता और दूरदर्शिता का परिचय देना पड़ता है।जनसाधारण द्वारा अपनाई गई रीति-नीति से ठीक उल्टी दिशा में चलना उस मछली के पराक्रम जैसा है जो जल के प्रचंड प्रवाह को चीरकर प्रवाह के विपरीत तैरती चलती है। आम तौर पर ज्यादातर लोगों को किसी भी कीमत पर संपन्नता और वाहवाही चाहिए। इसके विपरीत अपने व्यक्तित्व का निर्माण करने वाले लोगों को जहां सादा जीवन और उच्च विचार की नीति पर अमल कर संतोषी व अपरिग्रही बनना पड़ता है वहीं कभी-कभी उन्हें अपने साथियों के उपहास, असहयोग और विरोध का भी सामना करना पड़ता है।जिस किसी ने भी इस आत्म-निर्माण या व्यक्तित्व विकास के मोर्चे को फतेह कर लिया वह सस्ती तारीफ से वंचित हो सकता है, पर लोक-श्रद्धा उसके चरणों पर अपनी पुष्पांजलियां अनगिनत काल तक चढ़ाती रहती है। ऐसे लोग अपने गुणों के कारण महानता को उपलब्ध होते हैं।आत्म-विजेता को विश्व विजेता की उपमा अकारण ही नहीं दी गई है। दूसरों को उबारने और उन्हें दिशा देने की क्षमता मात्र ऐसे ही लोगों में होती है। आत्म-निर्माण या दूसरे शब्दों में कहें तो व्यक्तित्व का परिष्कार कर लेने वाले व्यक्ति एक दूसरा कदम और उठाते हैं। वह है दूसरों का कल्याण करना। ऐसे लोग पुण्य कमाने के लिए ऐसा नहीं करते, बल्कि आत्म-संतोष के लिए ही वे परोपकार करते हैं। प्रत्येक महामानव लोक मंगल के कार्यो में अपने जीत-जी संलग्न रहता है। शाश्वत सुख-संतोष रूपी सौभाग्य मात्र ऐसे ही लोगों को प्राप्त होता है। इतिहास इस बात का साक्षी है कि जिस शख्स ने दूसरों के दुखों को दूर करने का प्रयास किया है या जिसके मन में परोपकार करने का जज्बा रहा है, वह समय की शिला पर अपनी अमिट छाप छोड़ गया है। परोपकार सबसे बड़ा धर्म है। जीवन के सभी गुणों में इस गुण का सर्वाधिक महत्व इसीलिए है, क्योंकि यह हमें मानव होने का अहसास कराता है।
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2016-04-09T09:19:13+05:30
मानवता से बड़ा कोई भी जीवन में धर्म नही होता है , मगर इंसान मानवता के धर्म  को छोड़कर मानव के बनाये  हुए धर्मो पर चल पड़ता है , क्योंकि यह सब उसके  अज्ञानता के परिणाम होते है कि इंसान  इंसानियत को छोड़कर मानव-धर्मो में जकड़े जाते है , धर्मो की आड़ में  अपने मनो के अन्दर वैर , निंदा, नफरत, अविश्वास, जाती-पाति के भेद  के कारण अभिमान को प्रथामिकता  देता  है , इसके कारण ही मानव मूल मकसद को भूल जाता है, मानव जीवन में मानव प्यार करना भूल गया है, अपने मकसद को भूल गया है, अपने जन्मदात्ता को भूल गया है इससे मानव के मनो में हमेशा दानवता वाले गुण विधमान होते जा रहे है , आज धर्म के नाम पर लोग लहू -लुहान हो रहे है, आज हम मानवता को  एक तरफ रखकर अपनी मनमर्जी अनुसार धर्म को कुछ ओर ही रूप दे रहे है , जिस कारण इंसान ओर इंसान में दूरियां बढ़ रही हैं , कहीं जाति-पाति को मानकर कहीं परमात्मा के नामो को बांटकर तो कभी किसी और कारण से,  इन कारणों से  दिलो में नफरत बढती जा रही है , इंसानियत खत्म होती जा रही है , जहाँ पर इंसानियत खत्म होती है वहां पर  धर्म भी खत्म हो जाता है , इंसान, इंसानियत को भूल गया है जो पैगाम हमेशा दिया जा रहा है  "कुछ भी बनो मुबारिक है, पर सबसे पहले बस इंसान  बनो." उसको अपने मनो में से अपने स्वार्थो के पीछे निकाल दिया है .अभी कुछ समय पहले ही  मुंबई में तीन बम -काण्ड मानवता के विपरीत दानवता का उदाहरण  हैं जहाँ पर कितने  इंसानों का जान और माल का नुकसान हुआ  ओर परिवार के परिवार उजड़ गये , आज का इंसान एक दूसरे इंसान  का दुश्मन बना हुआ है सिर्फ अपने स्वार्थ के लिए ओर धर्मो के पीछे . किसी शायार ने भी कहा है कि :-" इंसान इंसान को डस रहा है  ओर सांप बैठकर हस रहा है "सतगुरु बाबा जी मानव को ब्रह्म-ज्ञान देकर उसके मन के विचारो में रहन-सहन , सोच-समझ में, तथा उसकी जीवन-शेली में बदलाव करते है ,इंसान में सिर्फ ज्ञान के बाद ही अच्छे  विचार तथा भावानाये प्रवेश करती है . ब्रह्म-ज्ञान के बाद ही सतगुरु बाबा जी की ओर संत-महापुरुषों जी की किरपा से  ही  नम्रता, विश्वास, सम्द्रष्टि , प्यार, सहनशीलता , परोपकार, आदि दिव्य गुंणों का समावेश होता है , इन संतो-महापुरुषों के संग  रहकर इंसान में भी यह दिव्य गुण अपने-आप  प्रवेश करते है , इन गुणों के कारण ही मानव-मानव के समीप आता है , ओर उनके दिलों की दूरियां खत्म होती है , इस सद्व्यवहार से ही मानव एकता कायम होती है .

हम अक्सर अरदास करते हैं "मन नीवां मत उच्ची" , उच्ची मत तो सिर्फ संतो की होती है , उच्ची  मत मिलेगी तो मन निमाणा हो जायेगा ,विनम्रता वाले भाव से हम युक्त हो जायेगे , अहम  के भाव दूर हो  जायेंगे, अभिमान के भाव से छुटकारा मिल जाएगा इसलिए  बाकी सारे जितने विकार है वो भी दूर हो जाते है तो इसलिए उच्ची मत धारण करना  महापुरुषों ने कल्याणकारी  माना है.हमेशा संतो-महापुरुषों के ये ही उपदेश आते है  , यह आत्मा का परमात्मा से मिलाप करवा कर इसका कल्याण करना है , मन को एकचित  करना है अगर मन इसके साथ जुड़ा रहता है , तो भरम मिटते  है, अहम् मिट जाता है , नफरत ओर जुल्म-सितम मिट जाते हैं  तो सुख मिलता है , आनंद मिलता है फिर हम दूसरों को रोता देखकर खुश नहीं होते हैं, जख्म देकर नहीं, भरकर खुश होते है , दूसरों को गिराकर कर नहीं, उठाकर खुश होते है , इस सत्य को जानकार हमारी इंसानियत की भावनाए बन जाती है, मानव में प्यार है तो गुलशन को सजाएगा , नफरत से तो वीरानी आती है, भला - सोचना , भला ही करना , मानव की असल निशानी है I 

" वसुधेव कुटुम्बकम"  की भावना मानव जीवन में साकार हो, संतजन ये ही आशा रखते है , हम सारे परोपकार का भाव ओर  ज्ञान का उजाले से  हमारा  जीवन सुखमय रहे , गुरु-किरपा से जब दिलो के तार जुड़ जाते है , तो हर मानव के लिए प्यार , नम्रता , श्रद्धा, ओर प्रेम  का विकास हो जाता है , ऐसा वातावरण बन जाता है  फिर अहम् , वैर, नफरत, की भावना अपने-आप खत्म हो जाती है ,  एकता की भावना बन जाती है , ये ही संतो-महापुरुषों की महान - देन  होती है . मानवता की मजबूती के लिए मन में सदभाव धारण करने होगे , यह संभव होता है, प्रभु की अनुभूति से. जब मन का नाता निर्मल-पावन परम-सता से जुड़ता है तो मन में भी निर्मलता व पावनता आ जाती है , आज सन्त निरंकारी  मिशन, परमात्मा की जानकारी करवाकर अंतर्मन के भावो को बदल रहा है, मन बदलता है तो स्वभाव बदलता  है  , विचार बदलते है , तो जीवन जीने का ढंग बदल जाता  है . फिर जीवन की  दिशा अपने-आप सही हो जाती है  फिर हर सांस कह उठती है :- "अव्वल अल्लाह नूर उपाया, कुदरत दे सब बन्दे, एक नूर ते सब जग, उपजिया कउन भले को मन्दे"सतगुरु आज ये ही सन्देश हमेशा अपने आशीर्वादो में देते जा रहे है . विश्व  में मानवता तभी कायम रहेगी जब हम सब मिलकर मानवता को अपने दिलों में मनों में बसायेंगे , हम प्यार से रहें, मिलवर्तन को बढावा दें, दूसरो को खुशिया बाँटें, आबाद करें, ऊच-नीच , जाति-पाति, वैर, निंदा , नफरत की भावना को त्यागकर सारे संसार की सेवा करें,  सतगुरु बाबा जी ने हमें सत्य से जोड़कर सहनशील व प्रेम से रहने के सीख दी है , प्रेम भाव से युक्त होकर मानव- एकता स्थापित होनी चाहिए, मानवता की वास्तविक बात तो प्रेम, दया , करुणा, सहनशीलता , ओर विशालता है , महापुरुषों - संतजनों ने हमेशा इंसानियत को यह ही  स्थापित करने का उपदेश दिया है  , मानवता को ही सच्चा धर्म माना है I  मानवता को खत्म करके कभी भी धर्म कायम नही रह सकता है , मानवता को खत्म करके कभी भी धर्म को नही बचाया जा सकता है I                 " मानवता को आओ बचाए , सुन्दर यह संसार बनाए"
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