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2016-04-26T13:04:11+05:30
प्रकृति और मनुष्य :

प्रकृति हमारी कितनी प्यारी, 
सबसे अलग और सबसे न्यारी, 
देती है वो सबको सीख, 
समझे जो उसे नज़दीक, 
पेड़,पौधे,नदी,पहाड़, 
बनाए सुंदर ये संसार, 
पेड़ पर लगे विभिन्न पत्ते, 
सिखाते हमे रहना एक साथ, 
पेड़ की ज़िंदगी जड़ों पर टिकी है, 
मनुष्य की ज़िंदगी सत्कर्मों पर टिकी है, 
आसमान है ये विशाल अनंत, 
मनुष्य की सोंच का भी ना है अंत, 
हे मनुष्य! समझो ये बातें सारी, 
प्रकृति हमारी कितनी प्यारी, 
सबसे अलग और सबसे न्यारी 
बूँद-बूँद से बनती है नदी, 
एक सोंच से बदले ये सदी, 
मनुष्य करता है भेदभाव, 
जाने ना प्रकृति का स्वभाव, 
सबको होती है प्रकृति नसीब हो अमीर या हो ग़रीब, 

मनुष्य की तरह ना परखें,
है अमीर या है ग़रीब, 
पेड़ सहता है बढ़ को, लेकर पृथ्वी का सहारा, 
मनुष्य सह सके बढ़ को,यदि सब खडें हो लेकर एक दूसरे का सहारा, 
करे जो प्रकृति को नाश, 
होता है उसका विनाश, 
मनुष्य जिए और जीने दे, 
मिलकर रहे सब एक साथ, 
परखो भैया यह बातें सारी, 
प्रकृति हमारी कितनी प्यारी, 
सबसे अलग और सबसे न्यारी. 


- सय्यद अरबाज़
 


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name of the poem?who is the author?
hm....im nt sure ,,,ill giv u anothr 1