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2015-03-17T10:03:43+05:30

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Uttrakhand trasdi -

17 march 2013 ki wo bhayank subah jab log badi shdrddha ke sath mandir ja rhe the tabhi achanak barish hone lagi log idhar udhar bhagne lage lekin is barish ne bhayanak roop dharan ker liya jiski chapet me pura kedarnath aa gya tha badh ke karan jan mal ko bhut nukshan hua aur bhut log is badh me beh gye kareeb 5000 se jayada log mare gye the hazaro ghar ujad gye fanse hue kai logo ko bachaya gya aise me bhi kai swarthy log apna swarth pura ker rhe the mandir ki tizori se sara paisa loot le gye jab logo ko khane pine ke lale pade hue the aur ve bhook se tadap rhe the tab unhi swarthy logo ne khana pani ke dam dugne ker diyakai log gayab ho gye the jinka aaj tak pta nahi chala  in sabke peeche khud manushya ka hi hath tha vatavaran me pradushan ke karan ke hua hai jo log bach gye the unhe helicopter ke dwara khana pani pahuchaya ja rha tha aur hamare desh ke jawan unhe surkshit jagah per hi pahucha rhe the lekin bachne ke bad bhi log is bhayanak manjar ko bhul nahi paye is bhayanak trasadi me kai log ne apno ko to kisi ne pure parivar ko hi kho diya kedarnath ki is bhayanak trasadi ne sab kuch tabah ker diya tha lekin sarkar ne ise punah ishthapit ker diya hai lekin logo ke ander se iska dar nahi nikal payi hai

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2015-03-17T11:37:51+05:30

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ऐसे में चारों धामो में प्रकृति ने कहर बरपाया तो उससे हताहत  लोगों की संख्या से अधिक हैरानी हो रही है।  दरअसल बाज़ार के पेशेवर यात्रा प्रबंधकों ने वहां हुए सड़क विकास का लाभ उठाया और हर शहर से अनेक लोगों को चारों धामों पर ले जाने लगे।  सड़क और रेल मार्ग से वह पूरा एक प्रस्ताव तैयार कर लोगों को अपना ग्राहक बनाते हैं।  उत्तराखंड दुर्गम है पर वहां बनी सड़कों से बसें जाने लगी थीं।  अनेक बस दुर्घटनाओं की खबर आती रहती थी।  वहां का रास्ता दुर्गम थाअब भी है और रहेंगा।  अनेक बसें जाती थीं।  सभी नहीं गिरी पर नियमित रूप से ऐसी बसों की दुर्घटनाओं की खबरें आती रहती थी।  जो यात्रा कर घर वापस लौटे उनके लिये रास्ता सुगम बना और जो नहीं लौटे वह भूत बनकर किसी को बता नहीं सकते थे कि उन्होंने दुर्गम रास्ते का अनुकरण किया था।  इस आवाजाही के बावजूद अनेंक लोग चारों धामों की यात्रा को सुगम नहीं  मानते थे।  यह अलग बात है कि पहले जब मार्ग दुर्गम दिखता था तब कम लोग जाते थे। वहां सड़कबिजली और होटलों के निर्माण का लाभ उठाकर  बाज़ार और प्रचार समूह ने धार्मिकता के साथ ही पर्यटन का लाभ दिलाने का बीड़ा उठाया।  जिससे वहां भीड़ बढ़ गयी।  बहरहाल चारों धामों का ऐसा कोई प्रचार नहीं हुआ था कि सामान्य लोगों को सहज विश्वास हो कि आपदा के समय वहां  लाखों की संख्या में वहां श्रद्धालू  होंगे। जब प्रचार माध्यमों ने इसकी पुष्टि की तब ही सच्चाई सामने आयी।उत्तराखंड में जो प्रकृति ने महाविनाशलीला मचायी उसमें भारी जन हानि का अनुमान शायद ही पहले किसी ने किया हो। र्तमान समय में जम्मू का वैष्णोदेवी और शिरडी के सांई बाबा के साथ भी अनेक लोग जुड़े हैं हालांकि इनका भारतीय धार्मिक दृष्टि से सामान्य महत्व है।  वैष्णोदेवी पर फिल्म आशा में गायक चंचल के गाये एक गीत ‘माता ने बुलाया है’ की वजह से वहां के मंदिर का नाम चमक उठा तो सांईबाबा पर फिल्म अमर अकबर ऐंथोनी में उनके मंदिर के  एक गाने में उनके चमत्कारों  गुणगान होने के बाद भक्तों की संख्या बढ़ी। आमतौर से सांईबाबा को धर्मनिरपेक्ष छवि का माना जाता है पर वास्तविकता यह है कि उनको हिन्दू भक्तों की ही भक्ति प्राप्त है।  वैष्णोदेवी और सांईबाबा पर जो भक्तों की भीड़ बढ़ी है उसका आधार कोई प्राचीन मान्यता नहीं वरन् आधुनिक बाजा़र और प्रचार समूहों की प्रेरणा उसका एक कारण है।        ऐसे में चारो धामों में इतनी सारी भीड़ होने देखकर अनेक लोगों को आश्चर्य तब हुआ जब हताहतों की संख्या का अनुमान बताया गया।  इन चारों धामों में पहले जो लोग जाते थे उनके परिवार वाले मालायें पहनाकर विदा करते थे।  माना जाता था कि  जीवन के उत्तरार्ध में की जाने वाली इस यात्रा में आदमी वापस लौटा तो ठीक न लौटा तो समझ लोे भगवान के पास चला गया।  महाभारत काल में पांडवों ने भी अपने अंतिम काल में ही हिमालय की यात्रा की थी।  हरिद्वार या ऋषिकेश तक यात्रा करना अनेक लोगों के लिये अध्यात्मिक शांति का उपाय है पर सच यह भी है कि आज भी हरिद्वार जाने की बात किसी से कही जाये तो वह पूछता है कि घर में सब ठीक तो है न! 
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