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2015-08-23T13:11:00+05:30
Essay on the man who has no inner life is a slave to his surroundings.
जिस मनुष्य का आंतरिक जीवन न हो , वह उसके परिवेश का गुलाम होता है। हेनरी फ्रेडरिक के इस कथन का अभिप्राय यह कि अगर व्यक्ति का कोई आंतरिक जीवन न हो तो ऐसी स्थिति में वह अपने परिवेश का नौकर के समान होता है। मनुष्य को अपने मन की आवाज को भी सुनना चाहिए और अपनी अंदरुनी अभिलाषाओं को समझना चाहिए ,अन्यथा उसका जीवन एक निर्जीव की तरह साधारण कार्यकलाप में व्यर्थ चला जाएगा।
अन्तः जीवन मतलब अपनी अंतरात्मा को पहचानना और उसके साथ संपर्क स्थापित करना। सही तरीके से जीवन का आनंद लेना यही है क़ि हम अपनी अंतरात्मा की आवश्यकताओं को भी समझें , नहीं तो यह जीवन रोजमर्रा के कार्यो में ही गुजर जाएगा।
आजीविका के लिए काम करना अनिवार्य परन्तु इसके साथ साथ अन्तर्मन् का ख्याल रखना भी जरुरी है।
अगर मनुष्य का अपने मन से जुड़ाव नहीं है तो वह एक गुलाम की तरह अपने आसपास के अनावश्यक कार्यो में अपना अनमोल जीवन व्यर्थ गवां देगा। प्रकृति के इस अनमोल जीवन में हमें अपने आंतरिक जीवन पर भी ध्यान देना चाहिए।
आज के आधुनिक युग में मनुष्य एक मशीन जैसा प्रतीत होता है। जो पेट भरने के लिए रोटी का तो इंतजाम करता है लेकिन अंतः जीवन की अनेक आवश्यकताओं को किनारे कर देता है। मोबाइल फ़ोन से हम दूर विदेश में बैठे मित्र से तो  बात कर लेते हैं लेकिन अपने अन्तः मन से कभी   वार्तालाप नहीं करते। विकास की इस अंधाधुंध दौड़ में मनुष्य का आंतरिक जीवन के प्रति प्रेम कम होता जा रहा है।धन कमाने की लालसा का कोई अंत नहीं है। कितनी भी भौतिक सुख सुविधाएँ जुटा लें लेकिन असली प्रसन्नता तब तक प्राप्त नहीं कि जा सकती जब तक कि आंतरिक मनोभाव प्रसन्न न हो। अगर अन्तः मन से संपर्क न हो तो हम आसपास के मायाजाल के गुलाम बने रहेंगे।
 इस प्रकार जिस मनुष्य का आंतरिक जीवन न हो , वह अपने आसपास की भौतिक दुनिया का गुलाम होता है। 

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