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2015-10-11T20:51:47+05:30

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    जयप्रकाश नारायण एक आदर्शवादी कार्यकर्ता थे जिसने भारतीय स्वतन्त्रता के लिए अपना जीवन समर्पित किया ।  उन्हों ने राजपूत राजाओं के पराक्रम के कथाएं और भगवद गीता पढ़ी और उनसे बहुत प्रभावित हुए ।  उन्हों ने अच्छे अंक पाये अपने मेट्रिकुलेशन में और अंग्रेजों  से चलनेवाले एक कालेज में भर्ती हुए।  जब मौलाना अजाद  ने भारतीयता के बारे में और अंग्रेजों के खिलाफ बोला, वे प्रभावित हुए और उसे छोड़कर भारत राष्ट्रिय कांग्रेस चलाने वाले एक विद्यापीठ में दाखिल हुए।

 
   नारायण ने एक स्वतंत्र योद्धा प्रभावती देवी से शादी की।  बाद में उन्हों ने अमेरिका में पढ़ाई की। जब वे अमेरिका में थे उन्हों ने अपनी बीबी को गांधीजी के आश्रम में रहने को कहा।  प्रभावती देवी कस्तूरबा जी के साथ स्वतन्त्रता की लड़ाई में भाग लेती थी।  अमेरिका से वापस आने के बाद नारायण जी जवाहरलाल नेहरू जी के पुकार सुनकर आजादी की लड़ाई में शामिल हो गए।  भारत राष्ट्रिय कॉंग्रेस में 1929 में भर्ती हुए।  गांधीजी के शिष्य बने।  अनेक बार जेल गए।  अंग्रेजों ने उन्हे बहुत मारा और पीठा ।  फिर  भी जेपी गांधीजी के साथ चले।

     राम मनोहर लोहिया
, मीनू मसानी , अशोक मेहता और यसुफ देसाई इत्यादी देशभक्तोंके साथ आजादी के लिए तरह तरह के विरोध अंग्रेजों के साथ कराते थे।  1932 में ग्णाधीजी के पुकार के अनुसार  सिविल-डिस-ओबीड़िएन्स (सहायता से इंकार) में भाग लिए और जेल गए।  जेल से भाग गए अपने दोस्तों के साथ।

 
     वे सोषलिस्म पर अधिक भरोसा करते थे।  इसी लिए कॉंग्रेस के अंदर होकर एक पार्टी “कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी” स्थापित किया और उसका मुख्य सचिव (जनरल सेक्रेटरी) बने।  राजनीति का मुख्य लक्ष्य होना चाहिए , उनके मत में , लोगों की खुशी में उद्धार ।   आजादी के बाद स्वार्थ में पैसे कमाने के काम नहीं किया । सिर्फ लोगों के सेवा में जीवन बिताया।  इस से पता लगता है कि वे निस्वार्थ योद्धा थे आजादी के, जैसे गांधीजी ।

 
     1942 में गांधीजी के क्विट-इंडिया (भारत छोड़ो) आंदोलन में एक नायक के रूप में खास भूमिका निभाई। उस अभियान में आगे के पहले पंक्ती  में से अंग्रेज़ पुलिस का सामना किया।  आजादी के बाद और गांधीजी  के मरने के बाद उन्हों ने इस पार्टी को कांग्रेस से अलग किया और लोगों की भलाई के लिए काम किया।

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2015-10-13T12:09:41+05:30
Jayprakash Narayan was born on 11 October 1902 in the village of Sitabdiara in Saran district of Bihar, India. He came from a Kayastha family.He was the fourth child of Harsu Dayal Srivastava and Phul Rani Devi. His father Harsu Dayal was a junior official in the Canal Department of the State government and was often touring the region. When Narayan was 9 years old, he left his village to enroll in 7th class of the collegiate school at Patna. While in school, Jayaprakash read magazines like Saraswati, Prabha and Pratap, books like Bharat-Bharati, and poems by Maithilsharan Gupta and Bharatendu Harishchandra which described the courage and valour of the Rajput kings. Jayaprakash also read the Bhagwad Gita. His essay, "The present state of Hindi in Bihar" won a best essay award. He excelled in school and by 1918 completed school and undertook the 'State Public Matriculation Examination' and won a District merit scholarship to Patna college.In October 1920, Narayan was married to Braj Kishore Prasad's daughter Prabhavati devi, a freedom fighter in her own right. At the time of marriage, Jayaprakash was 18 years and Prabhavati was 14 years of age, which was a normal age for marriage in that period. After their wedding, since Narayan was working in Patna and it was difficult for his wife to stay with him, on the invitation of Gandhi, Prabhavati became an inmate at the Ashram of Gandhi. Jayaprakash, along with some friends, went to listen to Maulana Abul Kalam Azad speak about the Non-co-operation movement launched by Gandhi against the passing of the rowlatt Act of 1919. The Maulana was a brilliant orator and his call to give up English education was "like leaves before a storm: Jayaprakash was swept away and momentarily lifted up to the skies. That brief experience of soaring up with the winds of a great idea left imprints on his inner being”. Jayaprakash took the Maulana’s words to heart and left Patna College with just 20 days remaining for his examinations. He joined the Bihar Vidyapeeth, a college run by the Congress.
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