Answers

2015-11-07T20:53:52+05:30
तुम्हें मैंने आह! संख्यातीत रूपों में किया है याद
सदा प्राणों में कहीं सुनता रहा हूं तुम्हारा संवाद
–बिना पूछे, सिद्धि कब? 
इस इष्ट से होगा कहां साक्षातकौन-सी वह प्रात,
 जिसमें खिल उठेगी क्लिन्न,
सूनी शिशिर-भीगी रात?चला हूं मैं;
 मुझे संबल रहा केवल बोध–पग-पग आ रहा हूं पास;
रहा आतप-सा यही विश्वासस्नेह के मृदुघाम से गतिमान रखना निबिड़मेरे सांस और उसांस।
आह, संख्यातीत रूपों में तुम्हें किया है याद!
1 5 1