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2015-11-24T22:04:10+05:30
प्रकृति सुन्दर रूप इस धरा का, आँचल जिसका नीला आकाश, पर्वत जिसका ऊँचा मस्तक, उस पर चाँद सूरज की बिंदियों का ताज नदियों-झरनो से छलकता यौवन सतरंगी पुष्प-लताओं ने किया श्रृंगार खेत-खलिहानों में लहलाती फसले बिखराती मंद-मंद मुस्कान हाँ, यही तो हैं,…… इस प्रकृति का स्वछंद स्वरुप प्रफुल्लित जीवन का निष्छल सार II
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2015-11-25T10:42:48+05:30
पर्वत कहता शीश उठाकर,
तुम भी ऊँचे बन जाओI 
सागर कहता है लहराकर ,
मन में गहराई लाओ I

समझ रहे हो क्या कहती है ,
उठ-उठ गिर कर तरल तरंग I
 भर लो, भर लो अपने मन में ,
मीठे-मीठे  मृदुल उमंग I

पृथ्वी कहती, धैर्य न छोड़ो,
कितनी ही हो सर पर भारI
नभ कहता है ,फैलो इतना ,
धक लो तुम सारा संसार II
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