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2016-04-18T20:20:32+05:30

आज के बदलते सामाजिक परिदृश्य में संयुक्त परिवार तेजी से टूट रहे हैं और उनकी जगह एकल परिवार लेते जा रहे हैं, लेकिन मनोचिकित्सकों की मानें तो आज की बदलती जीवनशैली और प्रतिस्पर्धा के दौर में तनाव तथा अन्य मानसिक समस्याओं से निपटने में अपनों का साथ अहम भूमिका निभा सकता है.

अपोलो अस्पताल में सीनियर कंसल्टेंट साइकाइट्री डॉ. प्रो. नीटू नारंग ने कहा कि संयुक्त परिवारों की सबसे बड़ी विशेषता उससे मिलने वाला भावनात्मक और नैतिक सहारा है.

उन्होंने कहा, घर में बड़े-बूढ़ों की मौजूदगी एक परामर्शदाता का काम करती है. घर में उनकी गैरहाजिरी में किसी समस्या या तनाव की स्थिति में सलाह या सहारा देने के लिए कोई मौजूद नहीं होता.

डॉ. नारंग ने कहा, एकल परिवारों के सदस्यों को अकेलेपन का सामना भी करना पड़ता है. खासकर तब जब बच्चे बड़े हो जाते हैं और स्कूल या कॉलेज जाना शुरू कर देते हैं.

उन्होंने कहा, एकल परिवारों में जब तक बच्चे छोटे रहते हैं तब तक पता नहीं चलता लेकिन उनके स्कूल या कॉलेज जाना शुरु करने पर माता-पिता को अधिक अकेलापन महसूस होता है, इसे ‘इंपिटिव सिंड्रोम’ कहते हैं. ऐसे में यदि संयुक्त परिवार है तो घर में कई सदस्य मौजूद होते हैं जिस कारण अकेलेपन का अहसास नहीं हो पाता.

डॉ. नारंग ने अमेरिका का उदाहरण देते हुए कहा कि वहां अकेलापन एक बहुत बड़ी समस्या के रूप में उभरकर सामने आ रहा है और इसका एक बड़ा कारण यह है कि वहां एकल परिवारों का ही चलन है.

परिवार की अहमियत बताते हुए मनोचिकित्सक डॉ संदीप वोहरा ने कहा कि संयुक्त परिवारों में आस पास काफी लोगों की मौजूदगी एक सहारे का काम करती है.

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