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2015-02-20T20:06:03+05:30

प्राकृत-उद्गमित, सम्प्रेषणा-युक्त, जन-तन्द्रा-अन्तक, भावपूर्ण मातृभाषा है-हिंदी ,हिंदी- वैसे तो यह इस देश की राजभाषा और हम सबकी मातृभाषा है परन्तु आज यह भाषा आज अपनी ही बुनियाद की रक्षा में लगी है। ये वही भाषा है जिसने इस सोते हुए राष्ट्र को दासता की नींद से जगाया। इसी भाषा ने भारत को स्वतंत्रता का अर्थ समझाया। यही वह भाषा है जो ऐतिहासिक स्वातंत्र्य-संघर्ष की साक्षी बनी। महात्मा गाँधी के अविस्मरणीय विचारों की माध्यम बनकर इसी भाषा ने देश में परिवर्तन की नींव रखी। यही वो भाषा है जिसने विभिन्न जाति-धर्म-समुदायों में बिखरे इस देश में प्रथम बार राष्ट्रवाद की स्थापना की। शुक्ल, द्विवेदी और प्रसाद ने इसका परिष्कार किया। प्रेमचंद, गुप्त और दिनकर ने इसमें भावनाएं भरी। और अंततः यह भाषा भारत में अभिव्यक्ति का पर्याय बनी। इस देश की संसदीय परंपरा को इसी भाषा ने जन्म दिया। न-जाने कितनी ही बोलियों की माता यह भाषा अनगिनत पत्रों-पुस्तकों-पत्रिकाओं के माध्यम से घर-घर पंहुचती रही। आज भी सिनेमा, टीवी और रेडियो के ज़रिये यही भाषा हमारा मनोरंजन कर रही है। एक माता के रूप में हिंदी तो अपने समस्त कर्त्तव्य समुचित रूप से निभाती रही, परन्तु हम कृतघ्न इस माँ के उपकारों को भूल कर अंग्रेजी(आंटी) की गोद में जा बैठे। मेरा उद्देश्य यहाँ हिंदी पर अंध प्रेम प्रदर्शित करते हुए अंग्रेजी का अतार्किक विरोध करना नहीं है, ऐसे कई मौलिक कारण है जो मातृभाषा के किसी भी राष्ट्र की सफलता के पीछे छुपे महत्व को प्रदर्शित करते हैं। कई लोगों का यह मत है की हिंदी देश के सभी लोग नहीं बोलते इसी कारण से हमें एक व्यापक अंतर्राष्ट्रीय भाषा को अपना लेना चाहिए। इसी कारण सर्वप्रथम हम लोगों की यह विचारधारा कि- हिंदी भारत की सर्वव्यापी भाषा नहीं है, का खंडन करना चाहेंगें। यह एक संपूर्ण भारत में मिले शिलालेखों एवं ताम्रपत्रों के माध्यम से प्रमाणित ऐतिहासिक तथ्य है कि 8 वीं शताब्दी ई.पू. तक संस्कृत आर्यों की सामान्य बोलचाल की भाषा होने के साथ ही साहित्य की परिनिष्ठित भाषा थी। कालांतर में(2री शताब्दी ई.पू.) यह भाषा देश में “पाली” भाषा तथा विदेशों में “अरबी” एवं “फारसी” में परिवर्तित हो गयी। भगवान भुद्ध ने अपने उपदेश पाली भाषा में ही दिए थे। 3री शताब्दी ई. तक आते-आते पाली भाषा से एक अपभ्रंश भाषा “प्राकृत” का जन्म हुआ। हिंदी साहित्य का प्रारम्भ इसी प्राकृत भाषा से हुआ है। प्राकृत भाषा सिंधु नदी से उस पार फारस में “हिंदवी” के नाम से जानी जाने लगी । वस्तुतः “हिंदवी”” शब्द की उत्पत्ति “सिंधी” से ही हुयी है, चूँकि फारसी लोग “स” को “ह” उच्चारित करते थे।  यही “हिन्दवी” शब्द बाद में हिंदी हो गया। अमीर खुसरो ने इसी भाषा में साहित्य की रचना की। इस प्रकार से यह स्पष्ट है की प्राकृत ही हिंदी भाषा थी।
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THANNKSS
but I guess its not of need to u
yeahh...
anyway hi
  • VRU
  • Ambitious
2015-02-22T03:29:20+05:30
कृत-उद्गमित, सम्प्रेषणा-युक्त, जन-तन्द्रा-अन्तक, भावपूर्ण मातृभाषा है-हिंदी ,हिंदी- वैसे तो यह इस देश की राजभाषा और हम सबकी मातृभाषा है परन्तु आज यह भाषा आज अपनी ही बुनियाद की रक्षा में लगी है। ये वही भाषा है जिसने इस सोते हुए राष्ट्र को दासता की नींद से जगाया। इसी भाषा ने भारत को स्वतंत्रता का अर्थ समझाया। यही वह भाषा है जो ऐतिहासिक स्वातंत्र्य-संघर्ष की साक्षी बनी। महात्मा गाँधी के अविस्मरणीय विचारों की माध्यम बनकर इसी भाषा ने देश में परिवर्तन की नींव रखी। यही वो भाषा है जिसने विभिन्न जाति-धर्म-समुदायों में बिखरे इस देश में प्रथम बार राष्ट्रवाद की स्थापना की। शुक्ल, द्विवेदी और प्रसाद ने इसका परिष्कार किया। प्रेमचंद, गुप्त और दिनकर ने इसमें भावनाएं भरी। और अंततः यह भाषा भारत में अभिव्यक्ति का पर्याय बनी। इस देश की संसदीय परंपरा को इसी भाषा ने जन्म दिया। न-जाने कितनी ही बोलियों की माता यह भाषा अनगिनत पत्रों-पुस्तकों-पत्रिकाओं के माध्यम से घर-घर पंहुचती रही। आज भी सिनेमा, टीवी और रेडियो के ज़रिये यही भाषा हमारा मनोरंजन कर रही है। एक माता के रूप में हिंदी तो अपने समस्त कर्त्तव्य समुचित रूप से निभाती रही, परन्तु हम कृतघ्न इस माँ के उपकारों को भूल कर अंग्रेजी(आंटी) की गोद में जा बैठे। मेरा उद्देश्य यहाँ हिंदी पर अंध प्रेम प्रदर्शित करते हुए अंग्रेजी का अतार्किक विरोध करना नहीं है, ऐसे कई मौलिक कारण है जो मातृभाषा के किसी भी राष्ट्र की सफलता के पीछे छुपे महत्व को प्रदर्शित करते हैं। कई लोगों का यह मत है की हिंदी देश के सभी लोग नहीं बोलते इसी कारण से हमें एक व्यापक अंतर्राष्ट्रीय भाषा को अपना लेना चाहिए। इसी कारण सर्वप्रथम हम लोगों की यह विचारधारा कि- हिंदी भारत की सर्वव्यापी भाषा नहीं है, का खंडन करना चाहेंगें। यह एक संपूर्ण भारत में मिले शिलालेखों एवं ताम्रपत्रों के माध्यम से प्रमाणित ऐतिहासिक तथ्य है कि 8 वीं शताब्दी ई.पू. तक संस्कृत आर्यों की सामान्य बोलचाल की भाषा होने के साथ ही साहित्य की परिनिष्ठित भाषा थी। कालांतर में(2री शताब्दी ई.पू.) यह भाषा देश में “पाली” भाषा तथा विदेशों में “अरबी” एवं “फारसी” में परिवर्तित हो गयी। भगवान भुद्ध ने अपने उपदेश पाली भाषा में ही दिए थे। 3री शताब्दी ई. तक आते-आते पाली भाषा से एक अपभ्रंश भाषा “प्राकृत” का जन्म हुआ। हिंदी साहित्य का प्रारम्भ इसी प्राकृत भाषा से हुआ है। प्राकृत भाषा सिंधु नदी से उस पार फारस में “हिंदवी” के नाम से जानी जाने लगी । वस्तुतः “हिंदवी”” शब्द की उत्पत्ति “सिंधी” से ही हुयी है, चूँकि फारसी लोग “स” को “ह” उच्चारित करते थे।  यही “हिन्दवी” शब्द बाद में हिंदी हो गया। अमीर खुसरो ने इसी भाषा में साहित्य की रचना की। इस प्रकार से यह स्पष्ट है की प्राकृत ही हिंदी भाषा थी।

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